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हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के समन्वय थे डॉ०आर इसरी अरसद

नालंदा से डीएसपी सिंह

साहित्यकार, कवि,प्रख्यात चिकित्सक डॉ०आर इसरी अरसद की 83 वीं जयंती संध्या पहर साहित्यकार हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी की अध्यक्षता में मनाई गई.शनिवार को स्थानीय शहर के नालंदा नाट्य संघ के सभागार में आयोजित जयंती समारोह में मौजूद उनकी तस्वीर पर पुष्पांजलि व माल्यार्पण कर श्रद्धा सुमन अर्पित किया.साहित्यकार डा० हरिश्चंद्र प्रियदर्शी ने जयंती समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि एक जाने-माने चिकित्सक-सर्जन प्रतिष्ठित साहित्यकार और एक महान समाजसेवी के रुप में डॉ आर इसरी अरसद किसी परिचय के मोहताज नहीं थे.नालंदा जिला का बुद्धिजीवी, साहित्यकार और सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता इनके व्यक्तित्व से हमेशा प्रभावित रहे.डॉ आर इसरी अपने हँसमुख व्यक्तित्व और माधुर्यपूर्ण वाक्य-चातुर्य से लोगों के मन में गहरी छाप छोड़ लेते थे.

भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, महान संत मनीराम और महान सूफी संत मख्दूम साहब की धरती पर जन्म लेने वाले डॉ आर इसरी वस्तुतः एक सूफी संत के समान दृष्टिगोचर होते हैं.इनके साथ में अकस्मात भगवान बुद्ध और सूफी संत मख्दूम साहब के उपदेशों और चारित्रिक विशेषताएं स्पस्ट परिलक्षित होते थे.इन्होंने अपने चिकित्सकीय कार्यों के अतिरिक्त सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं सामाजिक कार्यों में खूब नाम कमाया.लोगों को भारतीय वांग्मय (लिखित साहित्य का संग्रह) एवं भारतीय संस्कृति का समागम एक साथ डॉ आर इसरी के व्यक्तित्व में स्पस्ट परिलक्षित होता है.इस्लाम धर्म के पुजारी होते हुए भी एक सूफी संत की तरह कृष्ण और राधा के अनन्य भक्त के रुप में अपनी रचनाओं में स्थान देकर इन्होंने स्पस्ट किया है कि ईश्वर एक है और उसके विविध रूपों पर विरोध असंगत है.अपनी मातृभूमि की गरिमा को स्पस्ट करते हुए इन्होंने भगवान बुद्ध की जातक कथाओं तथा लोक गीतों पर सफल और अनुकरणीय टिप्णियों के साथ नवीन परिवेश में उसे समाज के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किये हैं.आज धार्मिक एवं सामाजिक-संस्कृतियों के मकड़जाल में यह निर्धारित करना कि कौन सा मार्ग उचित मंजिल तक ले जायगा.पूर्ण रुप से इस्लाम मानने वाले डॉ०इसरी जी जब हिंदी और हिन्दू सामाजिक व्यवस्था पर अपनी टिप्पणी और उद्गार प्रकट करते थे, तो कोई नहीं कह सकता कि डॉ.इसरी इस धर्म और परम्परा से अनजान व्यक्ति हैं.

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डॉ०आर इसरी के व्यक्तित्व का एक सुनहरा पक्ष है.उनका निराला हँसमुख और माधुर्यपूर्ण वाक् चातुर्य.अपने वाक् चातुर्य से इन्होंने कई विकट कार्यों के सम्पादन के साथ उच्च पदों पर आसीन महापुरुषों पदाधिकारियों को आकृष्ट कर अपने व्यक्तित्व का परिचय हमेशा देते रहे.कर्म प्रधान इस दुनियां में इन्होंने ‘गीता’ के उपदेशों के अनुरूप कर्म की प्रधानता स्वीकार की है.अपने सम्पर्क के व्यक्ति को भी कर्म की प्रधानता की दिशा निर्देशित की है.वस्तुतः डॉ.आर इसरी जी एक सफल चिकित्सक थे तथा उनके ह्रदय में एक साहित्यकार का प्रेम और परोपकार की भावना भरी हुई थी.यही कारण है कि इनकी सहजता, सरलता, व्यवहार-कुशलता पर सामान्य जनों के अतिरिक्त विद्वान भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे.नालंदा में किसी प्रकार का आयोजन हो, उसमें डॉ. इसरी जी अवश्य उपस्थित हीं नहीं रहते बल्कि अपने कुशलता और व्यक्तित्व का भी परिचय कराते थे.


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ओषधीय वनस्पति विशेषज्ञ साहित्यकार, कवि प्रो० लक्ष्मीकांत सिंह ने समारोह संचालन करते हुए अपने सम्बोधन में कहा कि डॉ आर इसरी का पूरा जीवन समाज के वंचित और गरीबों के प्रति सदैव समर्पित रहा.मशहूर शायर उर्दू साहित्य के विद्वान शिक्षाविद बेनाम गिलानी ने कहा कि डॉ आर इसरी अरसद हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के समन्वय थे.मौके पर साहित्यानुरागी राकेश बिहारी शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि डॉ० आर.इसरी सुविख्यात शल्य चिकित्सक, ह्रदय-रोग विशेषज्ञ, महान समाजसेवी थे.बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ० आर०इसरी जी ने कविकर्म के अलावा पत्रकारिता भी जमकर की।
उन्होंने अपने जीवन में कई पुस्तकों की रचना किया उनमें प्रमुख रूप से 1. जाने मन 2. बाल ईशफ़ 3. दर्दे मिन्नत कस 4. फहातिब इशब 5. जातक का उर्दु अनुवाद 6. सोहैल बनाम ईसरी 7 मगही लहर 8. क़ौमी एकता के प्रतीक मखदूम बिहारी 9. सूफ़ी सनातन की साहित्यिक सेवा 11. यादें 12. नालन्दा में क्रिस्चन इतिहास इत्यादि किताबें लिखे.

कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन साहित्यप्रेमी राकेश बिहारी शर्मा ने किया.समाजसेवी डॉ०आर०इसरी अरसद के सुपुत्र डॉ० फैशल अरसद इसरी ने अपने पिता जी के जीवनी पर वरिकी से प्रकाश डाला.मौके पर कवि गीतकार मुनेश्वर शमन, नालन्दा के सूफी कवि, छंदकार सुभाषचंद्र पासवान, नालन्दा के मशहूर युवा शायर तनवीर साकित, श्री नालन्दा नाट्य संघ के अध्यक्षथ रामसागर राम, शायर तंग अय्यूवी, मो.मुरतजा खान, संगीतकार अशोक कुमार यादि लोगों ने भाग लिया.


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