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गुजरात में बिहारी मजदूरों पर हमले और पलायन के खिलाफ प्रतिवाद मार्च निकाला गया और प्रधानमंत्री का पुतला दहन किया गया.

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धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के आधार पर भारतीयों को बांटना बंद करो – माले.

गुजरात में बिहारी मजदूरों पर हमले और पलायन के खिलाफ प्रतिवाद मार्च निकाला गया और प्रधानमंत्री का पुतला दहन किया गया. भाकपा माले कार्यालय से भारी संख्या में लोग निकले और नारे लगाते हुए विभिन्न मार्गो से होते हुए प्रखंड मुख्यालय परिसर में गए जहां पीएम का पुतला दहन किया गया और प्रतिवाद सभा की गई. कार्यक्रम में माले राज्य कमिटी सदस्य कॉमरेड जितेंद्र यादव, कामरेड रविंद्र यादव, गणेश यादव, शोएब आलम उर्फ नेता जी जिला मुख्यालय सदस्य विजय सिंह यादव, खभैनी पंचायत मुखिया विजय पासवान मुखिया समेत भारी संख्या में लोग शामिल हुए.

वक्ताओं ने कहा कि- हम सभी जानते हैं कि गुजरात में बिहारी मजदूरों सहित तमाम हिंदी भाषी लोगों पर लगातार हमले जारी हैं और उन्हें गुजरात से खदेड़ा जा रहा है. अभी तक 60 हजार लोग गुजरात छोड़ चुके हैं और पलायन लगातार जारी है. यह न सिर्फ बिहारी मजदूरों की रोजी-रोटी पर हमला है, बल्कि यह उनका घोर अपमान भी है. कल तक उन्हें महाराष्ट्र में अपमान झेलना पड़ता था, अब यह गुजरात में हो रहा है. देश के नागरिकों को देश में कहीं भी रोजी-रोटी के लिए जाने की आजादी है. लेकिन आज देश के नागरिकों को देश के ही भीतर खदेड़ा जा रहा है. धर्म – भाषा – क्षेत्रीयता के आधार पर राजनीति देश की एकता के लिए खतरनाक है. भाजपा आज यही राजनीति कर देश को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं।

तरह – तरह के कुतर्कों के जरिए गुजरात की भाजपा सरकार बिहारी मजदूरों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की बजाय मुद्दे को भटकाने की कोशिश कर रही है. अगर कांग्रेसी नेता अल्पेश ठाकोर हमला करवा रहे हैं, तो भाजपा को उन्हें गिरफ्तार करने से किसने रोक रखा है? दरअसल मोदी राज में गरीबों व कमजोर वर्ग के लोगों पर लगातार चौतरफा जारी हमले की ही यह अगली कड़ी है. मोदी के गुजरात मॉडल की असलियत भी यही है. 2014 के लोकसभा चुनाव के समय उत्तर प्रदेश – बिहार के इन्हीं मजदूरों ने मोदी के पक्ष में प्रचार किया था और उनकी जीत में भूमिका निभाई थी. अब उन्हें यह दिन देखना पड़ रहा है.

बिहार में भी भाजपा की ही सरकार चल रही है, लेकिन बिहारी मजदूरों की रक्षा के लिए जुबानी जमा-खर्च से ज्यादा सरकार कुछ नहीं कर रही है. बिहारी स्मिता की बातें करनेवाले नीतीश कुमार भी बिहारी मजदूरों की पीड़ा के प्रति संवेदनहीनता का ही प्रर्दशन कर रहे हैं. बिहार की गरीबी उन्हें रोजी-रोटी की तलाश में दर – दर की खाक छानने को मजबूर करती है. विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच बिहार से गरीबों का पलायन लगातार जारी है. नोटबंदी के समय भी भारी संख्या में बिहारी मजदूरों की रोजी – रोटी छिन गई थी और उन्हें बिहार लौटना पड़ा था. सरकार ने लेकिन उनके लिए कुछ नहीं किया. बिहारी छात्रों को भी देश में जगह – जगह इसी तरह का अपमान झेलना पड़ता है और बिहार सरकार टुकुर-टुकुर ताकती रहती है.

प्रतिवाद सभा को कॉ. जितेंद्र यादव, कॉ. रविन्द्र यादव समेत कई नेताओं ने संबोधित किया. अध्यक्षता कॉ. सोएब आलम उर्फ नेता जी ने की.

जुलूस में लोग नारे लगा रहे थे

” गुजरात में बिहारी मजदूरों पर हमला क्यों, प्रधानमंत्री मोदी शर्म करो!

गुजरात में बिहारी मजदूरों पर हमला क्यों, नीतीश कुमार जवाब दो!

धर्म – भाषा – क्षेत्रीयता के आधार पर भारतीयों को लड़ाना बंद करो!

क्षेत्रीयता के आधार पर देश तोड़ने की साजिश नहीं चलेगी!
गुजरात मॉडल का खुल गया पोल, बोल मजूरो हल्ला बोल!
नफरत और विभाजन की राजनीति मुर्दाबाद!
भाजपा भगाओ, देश बचाओ / लोकतंत्र बचाओ!
गुजरात से भगाए गए मजदूरों को मुआवजा और रोजगार देना होगा!”

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