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आज भी मोदी के ‘इंडियन रेलवे’ में गरीबों के साथ होता हैं गुलामों जैसा सलूक, विश्वास नहीं तो पढ़ें…

modi indian train

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ब्लॉग. दीपक भास्कर. भारतीय रेल में अगर आप सफ़र करते हैं, तो आपको इस देश की सड़ी-गली व्यवस्था का वीभत्स रूप अक्सर देखने को मिल जाता है. इस देश को नजदीक से जानने-पहचानने का सबसे महत्वपूर्ण जरिया, “भारतीय रेल” हीं है. शायद इसलिए महात्मा गाँधी ने १९१५ ईसवीं में, भारत को देखने और समझने के लिए, भारतीय रेल का हीं सहारा लिया था. वैसे, आजादी की लड़ाई से लेकर सामाजिक लड़ाई तक में, भारतीय रेल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है.

भारतीय रेल, सामाजिक और राजनैतिक क्रांति का जबरदस्त जरिया था. यह माना जाता है की, बहुत सारी सामाजिक बुराइयों को भारतीय रेल, कम करने में सहायक साबित हुई थी. भारतीय समाज भले हीं विभिन्न वर्णों एवं जातियों में विभाजित था लेकिन ट्रेन में सबको साथ बैठना हीं पड़ता था. कोई अमीर हो या गरीब, ऊँची जाति का हो अथवा नीची जाति का, अछूत हो या महिला, सभी अंग्रेजों के लिए, भारतीय रेल में बराबर थे. मतलब, भारतीय को ‘कुत्ते’ से अधिक कुछ भी नहीं समझा गया था. अंग्रेजों के लिए ‘भारतीय रेल’ नहीं बल्कि ‘इंडियन रेलवे’ था.

‘इंडियन रेलवे’ में भारतीयों का सफ़र करना मना था. अंग्रेजों लिए रेलवे, महज इस देश के प्राकृतिक सम्पदा को लूट कर ले जाने का माध्यम था. यह ‘इंडियन रेलवे’ और ‘भारतीय रेल’ का विभाजन हिन्दुस्तानियों को बहुत खलता भी था. जहाँ एक ओर ‘इंडियन रेलवे’ सभी सुविधाओं से लैस था, वहीं दूसरी तरफ ‘भारतीय रेल’ में लोग गाय-भैंसों की तरह ठूस दिए जाते थे. जहाँ एक ओर ‘इंडियन रेलवे’ समय का पाबंद था, वहीं दूसरी तरफ ‘भारतीय रेल’ में समय की पाबन्दी जैसी कोई चीज नहीं थी. ‘भारतीय रेल’ किसी सुनसान जगह पर घंटो खड़ा रहता था ताकि ‘इंडियन रेलवे’ को पास कराया जा सके. यह सब हो रहा था क्योंकि अंग्रेज, हिन्दुस्तानियों को नीचा दिखाना चाहते थे.

आजादी की लड़ाई, इस सपने के भी साथ लड़ा जा रहा था कि जब देश आजाद होगा तो ‘इंडियन रेलवे’ और ‘भारतीय रेल’ के बीच की खाई समाप्त हो जाएगी. हिन्दुस्तानी, इस नीचता के भाव से उबर जायेंगे. एक नई व्यवस्था बनेगी जिसमें ‘भारतीय रेल’ को घंटो खड़ा रहकर ‘इंडियन रेलवे’ को पास करते टकटकी लगाकर नहीं देखना पड़ेगा. भारतीयों के समय की भी कीमत बराबर होगी. उन्हें भारतीय होने पर गर्व होगा. हिंदुस्तान की आजादी के साथ हीं सभी को ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ के सिद्धांत के साथ बराबर कर दिया गया था. भारतीय, आजादी की लड़ाई में किये हर बलिदान को सफल मानने लगे थे. अब फिर से, सभी ‘भारतीय रेल’ में मूंछ तरेरते हुए, इस विश्वास के साथ सफ़र शुरू करने लगे थे कि अब अंग्रेज नहीं, किसी गोरे से भद्दी गाली सुनाने का डर नहीं. लेकिन फिर से ‘भारतीय रेल’ किसी सुनसान जगह पर घंटो खड़ी थी और सनसनाती हुई ‘इंडियन रेलवे’ पास कर रही थी. अब लोगों को झटका लगा था की सरदार भगत सिंह ने सही कहा था की आजादी के बाद शासन ‘भूरे लोगों’ द्वारा हो जायेगा, इसलिए लड़ाई समाजवाद के लिए लड़नी पड़ेगी.

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आजादी के सत्तर साल का जश्न अभी-अभी ख़त्म हुआ है और भारत के रेलवे स्टेशन पर उद्घोषणा सुनते हीं आपका दिल बैठ जाता है. हम सबको यह लगने लगता है की हम कितने असहाय हैं, कितने बेबस हैं. किसी उद्घोषणा में, यह कहा जाता है की किसी जगह से आने वाली ट्रेन पैंतीस घंटे विलम्ब से चल रही है. जो ट्रेन पिछली रात को रवाना होने वाली थी, वो आज रात की रवानगी के लिए संभावित है. किसी प्लेटफार्म से हांफते हुए आकर, कोई कहता है की वहाँ जाने वाली ट्रेन रद्द कर दी गयी है. बस सब तरफ अँधेरा सा छा जाता है. तभी प्लेटफार्म पर छुक-छुक करती ‘इंडियन रेलवे’ की लाल रंग में सरोबार, एक ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर लग जाती है. इस देश का वह ‘बराबर नागरिक’ सोच में पड़ जाता है कि उसने भी तो पैसे देकर टिकट ख़रीदा है, फिर उसकी ट्रेन रद्द कैसे हो गयी है.

उसे भी तो बहुत जरूरी काम था, अगर वो समय पर नहीं पहुंचा तो मालिक मजदूरी काट लेगा, वो तो देहाड़ी मजदूर है, रोज काम करना और उस मजदूरी पर जीवन गुजारना हीं उसकी नियति है. वो ये भी मानता है, कम पैसे होने की वजह से इसने उस ट्रेन का टिकट ख़रीदा है, जिसका भी नियत समय पर खुलना और पहुचना तय है, टिकट पर हीं तो लिखा है. यह अलग बात है इस ट्रेन को ज्यादा समय लगता है, लेकिन उसकी ट्रेन का कैंसिल होना, इतने लम्बे घंटो का विलम्ब होना तो, कहीं से भी न्यायोचित नहीं है.

लेकिन इस व्यक्ति को यह शायद पता नहीं की वो आजाद भारत के ‘भारतीय रेल’ का वो यात्री है, जो आज भी महज एक “संख्या” है, ‘कैटल क्लास’ है, “नागरिक” नहीं. किसी ‘इंडियन रेलवे’ में सफ़र करने वालों को शायद ये पता भी न चले की भारतीय रेल में सफ़र करने वाले “यात्री” नहीं बल्कि “योद्धा” होता है, जो अंत-अंत तक लड़ता है और कई बार शहीद भी हो जाता है. “भारतीय रेल” में आप वेटिंग टिकट लेकर भी चढ़ सकते हैं, कई बार बिना टिकट भी. पचहत्तर सीट वाली बोगी एक सौ पचहत्तर लोग होते हैं, वहीं दूसरी तरफ “इंडियन रेलवे” में आप किसी भी स्थिति में वेटिंग टिकट या बिना टिकट (टी टी को मैनेज करके) यात्रा नहीं कर सकते हैं.

जहाँ कभी रेल समाज को एक जगह लाकर बिठाने का काम करता था वहीं आज फिर से भारत दो भागों विभाजित में दिख रहा है. एक वो भारत जो “इंडियन रेलवे” का ‘यात्री’ है और दूसरा “भारतीय रेल” का ‘योद्धा’ है.

बहरहाल, इस देश की सरकार को ये कब समझ आएगा, की यह देश है न की किसी परचून की दुकान या फिर कोई मल्टी-नेशनल कंपनी जिसमें, हर पैसे वालों को स्पेशल अटेन्सन और सुविधा दी जाती है. अगर किसी ‘भारतीय रेल’ के योद्धा को न्याय नहीं मिले तो क्यूँ वो इस परचून की दुकान अपना माने. तो क्यूँ ना कोई कह दे की ये आजादी झूठी है. इस योद्धा ने तो अंग्रेजों को मार भगाया था लेकिन अपने हीं लोगों से कैसे लड़ेगा, इसलिए “मूक-योद्धा” बना हुआ है.

दीपक भास्कर, जेएनयु के अन्तराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान से पीएचडी हैं एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज में राजनीती के व्याख्याता हैं.

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