Input your search keywords and press Enter.

मानवता की प्रतीक मदर टेरेसा के ममत्व व प्रेम को कभी भुलाया नही जा सकता

नालन्दा से डीएसपी सिंह

संपूर्ण विश्व में शांति और मानवता का संदेश दिया मदर टेरेसा.मानव सेवा की महानतम मिसाल थी मदर टेरेसा.करुणा और सेवा की साकार मूर्ति थी मदर टेरेसा .मदर टेरेसा प्रेम वात्सल्य की प्रतिमूर्ति थी.

नालन्दा के मध्य विद्यालय ककड़िया के प्रांगण में विद्यालय के चेतना सत्र में भारत रत्न नोबेल पुरस्कार से सम्मानित, शांति की प्रतीक व मानव सेवा की महानतम मिसाल मदर टेरेसा की 108 वीं जयंती प्रधानाध्यापक शिवेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में मनाई गई.इस दौरान शिक्षक व बच्चों ने भारत रत्न, पद्मश्री मदर टेरेसा को याद किया और उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लिया.बच्चों व शिक्षकों ने मदर टेरेसा की तस्वीर पर माल्यार्पण व पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी.इस मौके पर शिक्षक नेता राकेश बिहारी शर्मा ने बच्चों को सम्बोधित करते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि ममता व मानवता की प्रतीक मदर टेरेसा के ममत्व व प्रेम को कभी भुलाया नहीं जा सकता.

मानवता व सेवा का जो उन्होंने संदेश दिया वह आज भी अनुकरणीय है.मदर टेरेसा एक महान और अद्भुत महिला थी.वो एक ऐसी संत थी जिन्होंने मानवता के एक सच्चे धर्म को इस दुनिया को दिखाया.मदर टेरेसा मात्र 18 वर्ष की उम्र में लोरेटो सिस्टर्स में दीक्षा लेकर वे सिस्टर टेरेसा बनीं थी.फिर वे भारत आकर ईसाई ननों की तरह अध्यापन से जुड़ गईं.कोलकाता के सेंट मैरीज हाईस्कूल में पढ़ाने के दौरान स्कूल के बाहर फैली दरिद्रता व गंदगी देख वे विचलित हो गईं.वह पीड़ा उनसे बर्दाश्त नहीं हुई और गरीब बस्तियों में जाकर सेवा कार्य करने लगीं.उन्होंने शुरु में झोपड़ियों में काम करना शुरु किया तथा बाद में मिशनरीज ऑफ चैरिटी का गठन किया जिसे 1950 में मंजूरी मिली.कहा जाता है कि मदर टेरेसा द्वारा स्थापित मिशनरीज ऑफ चैरिटी की शाखाएं असहाय और अनाथों का घर है.

Loading...

उन्होंने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’ के नाम से आश्रम खोले, जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों की स्वयं सेवा करती थीं.हमेशा नीली किनारी की सफेद धोती पहनने वाली मदर टेरेसा का कहना था कि दुखी मानवता की सेवा ही जीवन का व्रत होना चाहिए.हर कोई किसी न किसी रूप में भगवान है या फिर प्रेम का सबसे महान रूप है सेवा.यह उनके द्वारा कहे गए सिर्फ अनमोल वचन नहीं हैं बल्कि यह उस महान आत्मा के विचार हैं जिसने कुष्ठ और तपेदिक जैसे रोगियों की सेवा कर संपूर्ण विश्व में शांति और मानवता का संदेश दिया.वे स्वयं लाखों लोगों के इलाज में जुट गईं और शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाजी गईं.मदर टेरेसा आज हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनके विचारों को मिशनरीज ऑफ चैरिटी की सिस्टर्स आज भी जीवित रखे हुए हैं.उन्हीं में से कुछ सिस्टर्स आज भी सेवा कार्य में जुटी हुई हैं.ऐसी मानवता की महान प्रति मूर्ति मदर टेरेसा का देहावसान 5 सितंबर 1997 को हो गया था.

मदर टेरेसा को उनके सामाजिक कार्यों के लिए कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सम्मान और पुरस्कार मिले थे जिसमें भारत सरकार द्वारा वर्ष 1962 में उन्हें ‘पद्म श्री’ की उपाधि मिली.वर्ष 1971 में पोप जॉन शांति पुरस्कार, वर्ष 1971 में जॉन एफ कैनेडी अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, वर्ष 1979 शांति नोबेल पुरस्कार तथा वर्ष 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया.इस दौरान विद्यालय के शिक्षक सच्चिदानंद प्रसाद, सुरेश प्रसाद रजक, पूजा कुमारी, अनुज कुमार, अरविन्द कुमार, सुरेश कुमार, प्रतिमा कुमारी, बाल संसद के प्रधानमंत्री शुभम प्रकाश शर्मा, बाल संसद के शिक्षामंत्री गुड़िया कुमारी, मुकेश कुमार, प्रशांत कुमार, काजल कुमारी सुरभि कुमारी, मेनिका कुमारी, मोनी कुमारी इत्यादि विद्यालय के सैकड़ों छात्र-छात्रा मौजूद थे.

Leave a Reply

Your email address will not be published.