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पत्रकार की कलम से सच का आईना में तस्वीर देखिये मुख्यमंत्री जी,पुलिस विभाग में क्या हो रहा है…..

file photo

डीबीएन न्यूज(पंकज दुबे)-बिहार में पत्रकार खौफ में जी रहे हैं या यों कहें कि उनकी सुरक्षा भगवान भरोसे है.पुलिस -अपराधियों के गठजोड़ से सूबे के तमाम थाने में गोरख धंधा फल-फूल रहा है.निगाहवानी में जुटा पत्रकार ,आवाज़ उठाता है तो पहले उसे धमकी मिलती है ,जब नहीं माना तो लालच (हिस्सेदारी )की बात होती है.इसपर भी नहीं सुना तो सेटिंग कर पत्रकार की हत्या करा दी जाती है.ऐसे संघर्ष करनेवाले कुछ सूचना अधिकार कार्यकर्ता को भी जान गवानी पड़ी है.

ऐसा क्यों हो रहा है, इसके तह तक जाना और आम लोगों को जानना जरूरी है. चूँकि पत्रकार तो कुर्बानी दे रहे है लेकिन इसका सबसे बड़ा असर समाज पर पड़ रहा है.कुछ ही दिन पहले सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुले तौर पर तत्कालीन डीजीपी पी के ठाकुर की मौजूदगी में कहा था कि जिले के एसपी ,विधि -व्यवस्था कम, ट्रांसफर -पोस्टिंग के खेल में जुटे है. देश में ईमानदार छवि के रूप में पहचान रखने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को यह पता होगा या नहीं ,बल्कि ऐसा हमारे विश्वसनीय सूत्र बताते हैं कि उनके आवास में ड्यूटी दिलाने में भी थानेदार, इंस्पेक्टर का ट्रांसफर -पोस्टिंग का सेटिंग होता है और दोषी पुलिस पदाधिकारियों का बचाव की पैरवी भी. वह भी एक सिपाही एसआई द्वारा.

उक्त सिपाही ,एसआई को जिले के एसपी भी सर कह कर सम्बोधित करते है.वही कहावत काजी जी वाला….. . जिले के एसपी और डीएसपी की पोस्टिंग तो हाई लेवल पर होती है ,तो सेटिंग भी हाई लेवल का ही होता है.कुछ ही राजनेताओं का चलता है.

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बनाए गये व्यवस्था के अनुसार ,जन-सुरक्षा और सुरक्षित समाज की परिकल्पना थाना स्तर से शुरू होती है और सबकुछ थाना के रिपोर्ट पर आधारित होती है.थानेदार अगर ईमानदार नहीं है तो निष्पक्ष कार्रवाई नहीं होगा. तो यह समझ लीजिए कि इसका सबसे बुरा असर समाज के दबे-कुचले, आम लोगों पर पड़ता है और शोषण की गाथा से ही समाज में अपराध पनपता है.

सूबे के जिलों को ए , बी, सी ग्रेड में बांटा गया है.यह बेस्ट प्रोफरमेंस के आधार पर नहीं बल्कि मलाईदार थाना के रूप में.ए ग्रेड का थाना चाहिए तो उसे पे ऑन 15 लाख ,बी ग्रेड की कीमत 10 लाख और सी ग्रेड की थानेदारी चाहिए तो 5 लाख. यदा-कदा ऐसे है जिन्हें मुफ्त में भी लाभ मिल जाता है. लेकिन साहेब के नजर में सही नहीं होते.अब, आप ही सोचिए ,जो पुलिस पदाधिकारी थानेदार बनने के लिए मोटी रकम देगा वह क्या करेगा ? लाभ में चार गुणा कमाने की चाहत में अपने को दलाल और अपराधियों से सौदा करेगा ही . थानाध्यक्षों के काले कारनामें की शिकायतें का अंबार होता है.पीडि़तों की आवाज़ दब जाती है. दम तोड़ देती है. चूँकि वरीय पुलिस पदाधिकारियों का आशीर्वाद जो थानाध्यक्ष को मिला हुआ है.

कुछ बड़े मामले में त्वरित कार्रवाई हो गयी तो फिर जांच के नाम पर भी खेल, फिर क्लीनचिट सब होता है.पुलिस -दलाल-अपराधी के गठजोड़ से थाना क्षेत्र का गोरख धंधा का खेल शुरू हो जाता है.सब कुछ पर फिक्स्ड कर दिया जाता है.इनके रास्ते का रोड़ा, समाज का निगाहवानी कर रहा पत्रकार बनता है.

पत्रकारों को पहले पुलिस ही झूठे केस में फंसाने की धमकी देता है ,फिर अपराधी. जब इससे नहीं हुआ तो पत्रकारों को लोभ ( हिस्सेदारी ) की बात होती है. जब यह बात नहीं बनी तो फिर साजिश कर पत्रकारों की हत्या. आरा, सीवान, सीतामढ़ी, गया आदि जिलों में दर्जनों पत्रकारों की हत्या पुलिस -अपराधियों के गठजोड़ का ही परिणाम है.

जब तक पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार का बोल-बाला रहेगा तब तक निरंतर समाज के पहरेदार, पत्रकारों की हत्याएं होती रहेगी.और एक ही जिले में जमे जंक लगे थानेदार के संरक्षण में गोरख धंधा चलता रहेगा और अपराधियों का बोल बाला बना रहेगा.

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