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सुहागिनों ने अपने पति की लम्बी आयु के लिए की वट सावित्री की पूजा….

डीबीएन न्यूज/दलसिंहसराय(कुणाल गुप्ता)-अनुमंडल के ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में वट सावित्री पूजा के अवसर पर मंगलवार को सुहागिनों ने अपने पति की लम्बी आयु के लिए अपने नजदीकी वट-वृक्ष की पूजा की. शहर के गोला घाट स्थित बाबा द्रव्येश्वर नाथ मंदिर परिसर में एवं मालगोदाम परिसर में स्थित वट-वृक्ष पर सुबह से ही सैकड़ों महिलाएं रंगीन लाल-पीले-केसरिया वस्त्रों में वट-वृक्ष की विधिवत रूप से पूजा-अर्चना करती दिखी.

पुरोहितो की माने तो बरगद के पेड़ को हमलोग बड़ भी बोलते हैं और ‘बड़ या वर’ दूल्हा को बोला जाता है, इसी को प्रतीक मानकर बड़-पूजा किया जाता है.
पत्नियाँ अपने पति की लंबी आयु के लिए पूजा करती हैं और वनस्पतियों में सबसे लंबी आयु बरगद पेड़ की होती है और वृक्ष में धागा इसलिए बंधा जाता है कि धागा अटूट बंधन का प्रतीक होता है.


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वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए महिलाएं पवित्र धागे को बांधते हुए कामना करती हैं कि उनका वैवाहिक बंधन मजबूत और लंबे समय तक रहते हुए वह सदा सुहागिन बना रहें.

मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन बरगद के पेड़ के पास सावित्री ने अपने अल्पायु पति सत्यवान का पुनर्जीवन यमराज से प्राप्त की थी. हिन्दू धार्मिक शास्त्रों के अनुसार तब से ही यह परम्परा चली आ रही है.इस पूजा में ताड़ वृक्ष का भी बड़ा ही महत्व होता है. ताड़ के बने पंखों की पूजा की जाती है एवं घर जा कर महिलाएं इसी पंखों से अपनी पतियों के सामने हिला-हिला कर झलती है.
बाजारों में इसकी कीमत आज के दिन 60 से 100 रुपय तक है .

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वहीं आरा में भी सुहागिनों ने पति के लंबी आयु के लिए वट वृक्ष की पूजा की है. हमारे संवाददाता के अनुसार,आरा में मंगलवार को सुहागिनों ने वट सावित्री व्रत रखकर पति के लंबी आयु की कामना की. व्रती महिलाएं सोलह श्रृंगार कर बरगद के वृक्ष के नीचे मां सावित्री तथा सत्यावान की पूजा अर्चना की. विभिन्न तरह के फल अर्पित की. बरगद के वृक्ष में धागा लपेटकर उसका परिक्रमा किया. बाल में बरगद के पत्ते लगाई.बांस व ताड़ के बने पंखे से उन्हें हवा दी.

इस मौके पर पुजारी ने बताया कि भारतीय महिलायें प्राचीन काल से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार अपने पति के दीर्घ जीवी होने के लिए बरगद के पेड़ की पूजा और व्रत करती है. सावित्री ने की थी सत्यवान की रक्षा. इसी दिन ही सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण की रक्षा की.सावित्री और सत्यवान की कथा से वट वृक्ष का महत्व लोगों को ज्ञात हुआ क्योंकि इसी वृक्ष ने सत्यवान को अपनी शाखाओं और शिराओं से घेरकर जंगली पशुओं से उनकी रक्षा की थी.

इसी दिन से जेष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन वट की पूजा का नियम शुरू हुआ.शनि देव की कृपा पाने के लिए चाहें तो वट वृक्ष की जड़ों को दूध और जल से सींचें इससे त्रिदेव प्रसन्न होंगे और शनि का प्रकोप कम होगा.तथा धन और मोक्ष की चाहत पूरी होगी. वट वृक्ष की पूजा इस दिन आमतौर पर केवल महिलाएं करती हैं जबकि पुरूषों को भी इस दिन वट वृक्ष की पूजा करनी चाहिए.इसकी पूजा से वंश की वृद्घि होती है. वहीं महिलायें अपने – अपने घरों से प्रसाद की थाली व जल सरवत की लोटनी ले कर इस चिलचिती धूप में व्रती महिलाएं बरगद के वृक्ष तक पहुंची.


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