Input your search keywords and press Enter.

शोषितों अभिवंचितों की आवाज थे मुंशी प्रेमचंद जी. प्रेमचंद की कहानी व उपन्यास आज भी सामयिक.

नालन्दा,डीएसपी सिंह.

स्थानीय शहर के नालंदा नाट्य संघ कार्यालय के सभागार में साहित्यकार हरिश्चन्द्र प्रियदर्शी के अध्यक्षता और साहित्यकार, मगही कवि डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह के संचालन में हिन्दी साहित्य के धरोहर और विख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की 138 वीं जयंती मंगलवार संध्या पहर धूमधाम के साथ मनाई गई.

सर्वप्रथम संघ के सभागार में आयोजित जयंती समारोह में मौजूद उनकी तस्वीर पर पुष्पांजलि व माल्यार्पण कर श्रद्धा सुमन अर्पित किया.
मौके पर समारोह की अध्यक्षता करते हुए मशहूर गीतकार साहित्यकार डा. हरिश्चंद्र प्रियदर्शी ने जयंती समारोह को संबोधित करते हुए अपने शब्दों में कहा कि प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के भारतीय लेखकों में से एक हैं. जिनकी कृतियों में हमेशा शोषितों की आवाज बनकर रहते थे. उनकी लेखनी में सामंती व्यवस्था पर कटाक्ष रहता है. मुंशी प्रेमचंद की लेखनी में सदैव समाज के कमजोर, बेबस को मुख्य पात्र बनाकर चित्रण करना उनकी दृष्टि को उजागर करता है. उन्हें उपन्यासकार का योद्धा कहा गया है. गोदान, गबन जैसे उपन्यास पुस की रात और मानसरोवर जैसी कृतियां आज विश्व स्तर पर ख्याति अर्जित की है.

समारोह के संचालक साहित्यकार प्रो. डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह ने कहा कि प्रेमचंद का पूरा जीवन समाज के वंचित और शोषितों के प्रति सदैव समर्पित रहा है. उन्होंने प्रेमचंद के जीवनी और उनके साहित्यिक कार्य-कलापों व उनके द्वारा लिखे गये उपन्यासों तथा कहानियों पर विस्तार से चर्चा किया व वर्तमान तथा अतित का वर्णन किया.

प्रेमचंद की कहानी व उपन्यास आज भी सामयिक

साहित्यकार कवि मुनेश्वर शमन ने साहित्य शिरोमणि मुंशी प्रेमचंद को स्मरण करते हुए कहा कि वे सर्वहारा वर्ग के लिए कहानी व उपन्यास लिखते थे, जो कि आज भी सामयिक है. किसानों को केंद्र में रखकर प्रेमचंद रचित उपन्यास “गोदान” एक सर्वकालिक कालजयी कृति है.आज जब चतुर्दिक बढ़ती हुई संपन्नता के बीच भी अगर अन्नदाता किसान आत्महत्या कर रहे हैं, तो प्रेमचंद और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं. “गोदान” में भीषण विपन्नता के बीच भी “होरी” आत्महत्या की बात नहीं सोचता वह तो संघर्ष करता है और अच्छे दिन आने का इंतजार करता है.

Loading...

आज जहां सामाजिक जीवन ईमानदारी का क्षरण, भ्रष्टाचार का बोलबाला, सत्ता के पक्ष-विपक्ष द्वारा संरक्षण पा रहा हो तो हमें “पंच परमेश्वर” तथा नमक का दारोगा जैसी कहानियां रास्ता दिखाने का काम कर सकती है.


Widget not in any sidebars

साहित्यानुरागी समाजसेवी राकेश बिहारी शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि भ्रष्टाचार उस समय भी था और आज भी है इस लिए प्रेमचंद की कहानियां व उपन्यासों में कही गई बातें आज भी प्रासंगिक हैं. वर्षों पूर्व उन्होंने इस बात का चित्रण कर लिया था जो आज हमारे जीवन व संस्कारों से जुडे हुए हैं. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद किसानों व मजदूरों तथा लाचारों के कथाकार थे. इन्होंने आजीवन साम्राज्यवाद के खिलाफ रचना की. प्रेमचंद जी के समय में ग्रामीण परिवेश में जो कुरीतियां थी, वह आज भी अपना रूप बदल कर विद्यमान है. प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता, अंधविश्वास व कुरीतियों के खिलाफ कहानी व उपन्यास के माध्यम से जन आंदोलन चलाया. प्रेमचंद ग्रामीण परिवेश में दबे कुचले शोषितों के सिपाही थे. उन्होंने कहा कि आज के बढ़ते विज्ञान के युग में साहित्य के प्रति छात्रों की लगातार घट रही रूचि को बढ़ाने के लिए साहित्य व साहित्यकार प्रेमचंद जैसे शख्सियतों की जयंती मनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी. उन्होंने प्रेमचंद जी को यथार्थवादी साहित्यकार बताया.

जयंती समारोह में फ़िल्मकार एसके अमृत ने कहा कि प्रेमचंद्र हिंदी साहित्य के महासागर में गोता लगाने वाले एक महान योद्धा थे. उनकी लेखनी में सदैव सेवार्थ और आदर्शवाद को केंद्र बिंदु को मानकर लेखनी का काम किया है. प्रेमचंद्र के लेखनी में सदैव समाज के कमजोर निरीह और बेबस लोगों को मुख्य पात्र बनाकर चित्रण किया. गोदाम,गबन जैसे उपन्यास पूस की रात और मानसरोवर जैसे उनके कृति आज विश्व स्तर पर ख्याति अर्जित किया.

इस मौके पर रामसागर राम ने अपनी मंडली के साथ ‘बड़े घर की बेटी’ तथा ‘प्रेम की वेदी’ नाटक का मनोहारी मंचन किया और सामाजिक प्रेरणा से ओतप्रोत गीत प्रस्तुत किया.समारोह में साहित्यानुरागी राकेश बिहारी शर्मा, नृत्य कला के शिक्षक अजय आर्यन, संगीतकार नरेश जी, लक्ष्मी चंद्र आर्या, विकलांग अध्यक्ष सोनू सागर, संजय डिस्को, जय राम दास, प्रिया कुमारी, अमृता कुमारी, निरंजन कुमार,रितेश कुमार, हैप्पी कुमार, रिमाल कृष्णा आदि लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये.


Widget not in any sidebars

Leave a Reply

Your email address will not be published.