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क्या मोदी का किला जितनी तेजी से फैला था उतनी तेजी से सिमट जायेगा?

हालिया जो भी चुनाव हुए है उसमे यही देखा जा रहा है कि विपक्ष संगठित होने के कारण जो समीकरण अमित शाह या उनके सहयोगी दल बनाते थे वह अब नहीं बना पा रहे है और नतीजा हार हो रही है. कर्नाटक में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी पार्टी बनी लेकिन सत्ता से दूर रह गई. बीजेपी पहले गठबंधन कर सरकारें बनती थी लेकिन अब विपक्ष का महागठबंधन बन रहा है. कहीं न कहीं विपक्ष को समझ आ गया है कि बिना मोह माया के मिल कर लड़ना होगा तभी मोदी को हराया जा सकता है. ऐसा चलता रहा तो मोदी का किला जितनी तेजी से फैला था उतनी तेजी से सिमट जायेगा.

बिहार उपचुनाव हो या यूपी, जब योगी अपने घर में नहीं जीता सकते है तो कहीं न कहीं बीजेपी को समझ आ गया है कि यूपी में मायावती और अखिलेश, बीजेपी पर भारी पर रहे है.

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बिहार में फिर नीतीश कुमार और बीजेपी का गठबंधन मजबूत है और उपचुनाव को छोड़ दे तो राजद के लिए लोकसभा में बढ़त बनाना इतना आसान नहीं होगा. और कई राज्यों में समीकरण लोकसभा चुनाव से पहले ख़राब होता जा रहा है, जैसे महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश तथा बिहार में लाइन में है. नीतीश कुमार हमेशा से विशेष राज्य के दर्जे का मांग कर रहे है लेकिन केंद्र इसपर कुछ नहीं बोल रहा है ऐसे में अगर नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव में जायेगे तो क्या कहेंगे हम अपनी मांगो पर अडिग है. मुझे नहीं लगता इस बात को जनता स्वीकार करेगी की आप बीजेपी से सरकार बना कर मोदी से मांग करते रहे. लोग कहेंगे तो आगे भी क्या उम्मीद की मांग पूरी होगी.

बिहार को मोदी सरकार ने विशेष पैकेज देने का जो वादा किया था उसका भी आता पता नहीं है. बाढ़ में भी जो सहायता मिलनी चाहिए थी उतना नहीं मिला. तो समझ जाइए 2019 का चुनाव कितना दिलचस्प और मोदी सरकार के लिए कठिन होते जा रहा है.


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