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देखिये कैसी है जाह्नवी कपूर कि फ्लिम ‘धड़क ‘

पराग छापेकर

स्टार कास्ट: जाह्नवी कपूर, ईशान खट्टर, आशुतोष राणा आदि

निर्देशक: शशांक खेतान

निर्माता: करण जौहर

काफी समय से मराठी फ़िल्म ‘सैराट’ के हिंदी रीमेक फ़िल्म ‘धड़क’ का लोगों को इंतज़ार था. ‘सैराट’ ने सौ करोड़ से ज्यादा की कमाई कर देशवासियों का दिल जीता था और उसका जादू हिंदुस्तान में सिर चढ़ कर बोल रहा था. ऐसे में हिंदी भाषी क्षेत्र में ‘सैराट’ की रीमेक ‘धड़क’ का इंतज़ार किया जा रहा था.

डायरेक्टर शशांत खेतान की इस फ़िल्म का फर्स्ट हॉफ काफी स्लो है जो काफी घसीटते हुए आगे बढ़ता है. ‘सैराट’ में प्यार को लेकर जो एक इनोसेंस था उस तरह का ट्रीटमेंट ‘धड़क’ में कहीं नज़र नहीं आता. दूसरी जो खामी इस फ़िल्म में है वो यह कि ‘सैराट’ में वर्गभेद या जातिभेद के मुद्दे को विशुद्ध तौर पर फ़िल्म में क्लैरिफाय किया गया था जबकि ‘धड़क’ में एक संवाद के अलावा यह कहीं पर स्पष्ट नहीं हो पाता है कि आखिर दोनों में विसंगतियां किस बात को लेकर है? यह कहीं पर स्पष्ट नहीं हो पाता है कि आखिर यह मतभेद है क्यों?

सेकण्ड हॉफ में भी कई शॉर्ट्स बहुत लम्बे हो जाते हैं! ईमानदारी से कहा जाए तो चूंकि ‘धड़क’ सैराट की ऑफिशियल रीमेक है तो ज़ाहिर है दोनों में तुलना होगी ही. लेकिन, फिर भी एक चांस दिया जाए और ‘सैराट’ से अलग इस फ़िल्म को देखा जाए, परखा जाए तब भी फर्स्ट हॉफ काफी खींचा हुआ नज़र आता है, फ़िल्म में इनोसेंसी का अभाव नज़र आता है. साथ ही साथ पूरा माहौल जो शशांक ने बनाया है वो काफी सिंथेटिक नज़र आता है.

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लेकिन, फिर भी अगर इसमें अभिनय की बात की जाए तो जाह्नवी कपूर से लोगों को जिस तरह की उम्मीदें थीं वो उस पर खरी उतरती हैं. जाह्नवी कपूर के बारे में कहा जा सकता है कि बॉलीवुड को एक और हीरोइन मिल गयी है. ईशान खट्टर एक शानदार परफॉर्मर हैं. ईशान और जाह्नवी की जोड़ी आने वाले समय में बॉलीवुड के लिए एक एसेट की तरह साबित होगा, यह इस फ़िल्म का एक प्लस पॉइंट है. अन्य कलाकारों में खरज मुखर्जी, आदित्य कुमार, मनीष वर्मा और गौरी ने भी अपने अभिनय से प्रभावित किया.

मराठी फ़िल्म का संगीत चूंकि इतना पॉपुलर हो गया था कि हिंदी में भी वही बैकग्राउंड स्कोर रखा गया है. तो एक तरह से वो रिपीटेशन लगता है, क्योंकि देश भर में वो गाने सुने जा चुके हैं सिर्फ शब्द बदल गए हैं. अपनी क्रियेटिविटी चलाते हुए शशांक खेतान ने फ़िल्म का क्लाइमेक्स ही बदल दिया, जो आसानी से हजम नहीं होता. असल में जो क्लाइमेक्स था उसमें कहीं न कहीं एक संदेश था कि जातिभेद और ऑनर किलिंग से आने वाली नस्ल को मुक्त किया जाए.

धड़क में डायरेक्टर ने अपनी क्रिएटिविटी दिखाते हुए क्लाइमेक्स को बदल दिया है और इस क्लाइमेक्स में किसी तरह का सामाजिक संदेश नज़र नहीं आता जब तक कि लास्ट स्क्रीन रोल पर नज़र नहीं जाती और उसे पढ़ा न जाए. कुल मिलाकर ‘धड़क’ एक सामान्य सी बॉलीवुड फ़िल्म है, जिसे आप देखना चाहें तो देख सकते हैं.


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