Input your search keywords and press Enter.

आज आपका दिन एक सेकंड बड़ा होने वाला है

क्या आपको पता है कि आपका आज का दिन एक सेकंड बड़ा होने वाला है? इसे साइंस की भाषा में ‘लीप सेकंड’ कहते है. हमारी घड़ियों में अब तक 25 बार यह ‘लीप सेकंड’ जोड़ा जा चुका है. हर 18-24 महीने में एक बार इन्हें सुविधानुसार 30 जून या 31 दिसम्बर की रात को जोड़ा जाता है.

दरअसल, सालों पहले ‘इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन सर्विस’ की एक रिसर्च में पता चला कि हमारी धरती अब अपनी धुरी पर एक चक्कर लगाने में 2.3 मीलीसेकंड का समय ज्यादा ले रही है. यानी एक दिन में 86,400.002 सेकंड्स हो रहे हैं. इसकी वजह धरती और चन्द्रमा के बीच लगने वाला ग्रेविटेशनल फ़ोर्स है. जिसके बाद, इस अंतर के एक सेकंड पूरा होने पर इन्हें हमारी घड़ी में जोड़ने की परंपरा शुरू हुई. लेकिन इससे हमारी, आपकी घड़ी को कोई फर्क नहीं पड़ता. ये काम दुनिया में अलग अलग जगहों पर लगी करीब 400 एटॉमिक घड़ियों के साथ किया जाता है.

अब सवाल ये है कि इससे हमारी और आपकी जिंदगी पर क्या असर पड़ने वाला है. इससे पहले आइये जानते हैं कि आखिर हमारे टाइम को नियंत्रित करने वाला सिस्टम क्या है?

हमलोग समय की गणना ‘एस्ट्रोनॉमिकल आब्जर्वड टाइम‘ (यूटीआई) के आधार पर करते हैं, साथ ही वैज्ञानिक और इलेक्ट्रॉनिक गणनाओं के लिए ‘कोऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम’ (यूटीसी) का इस्तेमाल करते हैं. समय का SI मानक सेकंड है, जो सीज़ियम धातु के अणु द्वारा एक निश्चित संख्या में किये गए कम्पनों में लगने वाले कुल समय से बनता है. यूटीसी इसी सिस्टम पर आधारित है.

जैसा कि हम सब जानते हैं, सूर्योदय और सूर्यास्त, धरती के अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करने के अनुसार होते हैं. खगोलीय गणना(यूटीआई) में यही सेकंड, मिनट और घंटा का आधार है. हमने अपनी दिनचर्या को सूर्योदय और सूर्यास्त के हिसाब से ढाल लिया है तो धरती की गति में कोई भी परिवर्तन हमारे समय की सेटिंग को गड़बड़ कर सकता है.

अब जानते है कि आखिर समस्या क्या है?

Loading...

हमारी आज की दुनिया बहुत हद तक कंप्यूटरों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन डिवाइसेज पर निर्भर है. ये सभी अपने टाइम सेटिंग के लिए ‘नेटवर्क टाइम प्रोटोकाल’ का यूज़ करते हैं. ये यूटीसी के हिसाब से इन डिवाइसेज का समय सही रखते हैं.

साइंटिस्ट्स एटॉमिक घड़ियों में तो एक सेकंड जोड़ सकते हैं मगर हमारे अन्य यंत्रों में यह संभव नहीं है. इसी वजह से जब दुनिया भर की एटॉमिक घड़ियाँ 30 जून की रात 11:59:59 के बाद 11:59:60 का टाइम दिखाएंगी, अन्य डिजिटल घड़ियाँ ऐसा नहीं कर पाएंगी क्यूंकि उनकी प्रोग्रामिंग में ऐसा नहीं है. पिछली बार जब जून 2012 में ऐसा किया गया था तो ‘मोजिला’ और ‘लिंक्डइन’ जैसी वेबसाइट क्रैश हो गयी थीं. लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम और जावा लैंग्वेज वाले प्रोग्राम भी गड़बड़ हो गए थे. इस वजह से दुनिया भर में करोड़ों कंप्यूटर प्रभावित हुए थे साथ ही बैंकिंग सिस्टम, एयरलाइन्स ट्रैफिक कंट्रोल और जीपीएस आधारित ट्रांसपोर्ट सर्विस पर भी बुरा असर हुआ था.

30 जून 1972 को पहली बार लीप सेकंड जोड़ा गया था. फिलहाल दुनिया की बड़ी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियां इस समस्या का हल निकालने में लगी हुई हैं. उन की मेहनत कितनी सफल होती है ये तो आज रात को ही पता चलेगा. सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट्स की सबसे बड़ी प्रॉब्लम यह है कि इस एक सेकंड की वजह से कंप्यूटरों में हर बार कुछ नयी तरह की दिक्कतें सामने आ जाती हैं जिनका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है.

अमेरिका सहित कई देश इस लीप सेकंड  को ख़त्म करने की मांग कर चूके हैं मगर अन्य बहुत सारे देशों के विरोध की वजह से यह अबतक संभव नहीं हो सका है.

अगर हमलोग लीप सेकंड जोड़ना हटा भी दें तो इससे यह समस्या बस कुछ सौ सालों के लिए टल जायेगी, ख़त्म नहीं होगी. तब हमें 2600 ईस्वी के आसपास ‘लीप ऑवर’ जोड़ना होगा. नहीं तो लगभग 10000 ईस्वी में लोग रात के 1 बजे सुबह का नाश्ता कर रहे होंगे.

Leave a Reply

Your email address will not be published.