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सुहागिनों ने किया चतुर्थी व्रत

आरा,रामाशंकर प्रसाद

भाद्रपद कृष्णपक्ष की चतुर्थी के दिन गणेश चतुर्थी एवं बहुरा व्रत मनाया जाता है.विवाहिताएं गणेश चतुर्थी व्रत पुत्र प्राप्ति व उसके दीर्घायु के लिए रखती हैं.जबकि बहने अपने भाई के दीर्घायु के लिए बहुरा व्रत रखती हैं.बुढ़वा महादेव मंदिर नकुल मिश्रा ने बताया कि एक पंडित अपने यहां गाय पाले हुए थे.जिसका नाम बहुरा था.वह प्रतिदिन घास चरने के लिए पहाड़ पर जाया करती थी.चरते-चरते वह एक बाघ की गुफा में घुस गई.बाघ भूखा था.वह अपनी भूख शांत करने के लिए गाय की ओर दौड़ा.इसी बीच बहुरा गाय ने हाथ जोड़कर बाघ से छोड़ देने की प्रार्थना की.कहा कि मेरे बच्चे घर पर मेरा इंतजार कर रहे हैं.मैं आपको विश्वास दिलाती हूं कि अपने बच्चों को दूध पिलाकर व लाड़-प्यार कर आपके पास आ जाऊंगी, उसके बाद मुझे खा लेना.यह सुनकर बाघ ने बहुरा गाय को छोड़ दिया.बहुरा वहां से घर लौटकर अपने बच्चों को दूध पिलाकर व लाड़-प्यार कर बाघ के पास वापस पहुंची.यह देख बाघ आश्चर्यचकित रह गया.उसने गाय की सत्यनिष्ठा एवं ईमानदारी को देख उसे खाने से मना कर दिया और अपना बहन स्वीकार किया.तब से यह बहुरा पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाने लगा.पुराणों में बताया गया है कि गंधर्व नामक व्यक्ति किसी ऋषि के श्राप के कारण वह बाघ बन गया था.पर्व बुधवार को शहर से लेकर गांव तक बहुरा एवं गणेश चतुर्थी व्रत की धूम मची रही.

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परंपरा और मान्यताओं के मुताबिक सुहागिनों ने अपने अचल सुहाग के लिए जहां चतुर्थी व्रत किया, वहीं युवतियों ने भी अपने भविष्य की मंगल कामना एवं सुंदर वर और भाई के दीर्घायु के लिए बहुरा व्रत किया.पूरे दिन उपवास रह कर व्रतियों ने विभिन्न जलाशय, तालाब एवं नदियों ने स्नान कर घर में भगवान गणेश की प्रतिमा बना कर पूजा -अर्चना की.इसके बाद व्रतियाें ने व्रत की कथा सुन फलाहार किया.सुहागिनें देर शाम रात तक चंद्रोदय का इंतजार करती है.चंद्रमा के उदय होने के साथ ही वैदिक मंत्रों के बीच व्रतियों ने अर्घ अर्पित कर पूजा-अर्चना करती हैं.पर्व को लेकर खास कर युवतियों में जागरूकता रहीशाम होते ही अधिकतर परिवारों में गणेश तथा शिव जी के मंगल गीत गूंजने लगे.आस्था और भक्ति का पावन पर्व बहुरा सह गणेश चतुर्थी हर्षोल्लास के साथ संपन्न हो गया

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