Input your search keywords and press Enter.

बाल मजदूरी में पिसता बचपन…


न्यूज़ डेस्क : बाल-श्रम भारत के लिए अभिशाप मधुरेश.मुजफ्फरपुर-बाल-श्रम मानवाधिकार का खुला उल्लंघन है.यह भारत के लिए अभिशाप भी है. इससे बच्चों का मानसिक,शारीरिक,आत्मिक, बौद्धिक एवं सामाजिक विकास प्रभावित होता है. उक्त विचार आदर्श बिहार छात्र संघ मुजफ्फरपुर की महानगर इकाई द्वारा विश्व बाल श्रम उन्मूलन दिवस के अवसर पर चंद्रलोक चौक स्थित महानगर कार्यालय पर आयोजित

संगोष्ठी को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए संगठन के प्रदेश महामंत्री डॉ.ध्रुव कुमार सिंह ने व्यक्त किये. डॉ. सिंह ने कहा कि भारतवर्ष में प्रारंभ से ही बच्चों को भगवान का रूप माना जाता है. ईश्वर के बाल रूप यथा ‘बाल गणेश’, ‘बाल गोपाल’, ‘बाल कृष्णा’, ‘बाल हनुमान’ आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. भारत की धरती ध्रुव, प्रह्लाद, लव-कुश एवं अभिमन्यु जैसे बाल चरित्रों से पटी हुई है.

बच्चों का वर्तमान दृश्य इससे भिन्न है. बच्चों का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है. ग़रीब बच्चे सबसे अधिक शोषण का शिकार हो रहे हैं. ग़रीब बच्चियों का जीवन भी अत्यधिक शोषित है.छोटे-छोटे ग़रीब बच्चे स्कूल छोड़कर बाल-श्रम हेतु मजबूर हैं. बच्चे आज के परिवेश में घरेलू नौकर का कार्य कर रहे हैं.

वे होटलों, कारखानों, सेवा-केन्द्रों, दुकानों आदि में कार्य कर रहे हैं, जिससे उनका बचपन पूर्णतया प्रभावित हो रहा है। भारत के संविधान, 1950 का अनुच्छेद 24 स्पष्ट करता है कि 14 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे को ऐसे कार्य या कारखाने इत्यादि में न रखा जाये जो खतरनाक हो। कारखाना अधिनियम, बाल अधिनियम, बाल श्रम निरोधक अधिनियम आदि भी बच्चों के अधिकार को सुरक्षा देते हैं किन्तु इसके विपरीत आज की स्थिति बिलकुल भिन्न है।

Loading...

पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार एवं राज्य सरकारों की पहल इस दिशा में सराहनीय है. उनके द्वारा बच्चों के उत्थान के लिए अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया गया हैं, जिससे बच्चों के जीवन व शिक्षा पर सकारात्मक प्रभाव दिखे। शिक्षा का अधिकार भी इस दिशा में एक सराहनीय कार्य है. इसके बावजूद बाल-श्रम की समस्या अभी भी एक विकट समस्या के रूप में विराजमान है। इसमें कोई शक नहीं कि बाल-श्रम की समस्या किसी भी देश व समाज के लिए घातक है. बाल-श्रम पर पूर्णतया रोक लगनी चाहिए. बाल-श्रम की समस्या जड़ से समाप्त होना अति आवश्यक है.

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए महानगर उपाध्यक्ष डॉ. नीरज कुमार ने कहा कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2 करोड़ और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार तो लगभग 5 करोड़ बच्चे बाल श्रमिक हैं। इन बालश्रमिकों में से 19 प्रतिशत के लगभग घरेलू नौकर हैं, ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में तथा कृषि क्षेत्र से लगभग 80% जुड़े हुए हैं। शेष अन्य क्षेत्रों में, बच्चों के अभिभावक ही बहुत थोड़े पैसों में उनको ऐसे ठेकेदारों के हाथ बेच देते हैं जो अपनी व्यवस्था के अनुसार उनको होटलों,कोठियों तथा अन्य कारखानों आदि में काम पर लगा देते हैं.

उनके नियोक्ता बच्चों को थोड़ा सा खाना देकर मनमाना काम कराते हैं। 18 घंटे या उससे भी अधिक काम करना, आधे पेट भोजन और मनमाफ़िक काम न होने पर पिटाई यही उनका जीवन बन जाता है। केवल घर का काम नहीं इन बालश्रमिकों को पटाखे बनाना, कालीन बुनना, वेल्डिंग करना, ताले बनाना, पीतल उद्योग में काम करना, कांच उद्योग, हीरा उद्योग,  बीड़ी बनाना, खेतों में काम करना (बैल की तरह), कोयले की खानों में, पत्थर खदानों में,  दवा उद्योग में तथा होटलों व ढाबों में झूठे बर्तन धोना आदि सभी काम मालिक की मर्जी के अनुसार करने होते हैं.

इन समस्त कार्यों के अतिरिक्त कूड़ा बीनना, पोलीथिन की गंदी थैलियाँ चुनना, आदि अनेक कार्य हैं जहाँ ये बच्चे अपने बचपन को नहीं जीते, नरक भुगतते हैं. इनके बचपन के लिए न माँ की लोरियां हैं न पिता का दुलार, न खिलौने हैं, न स्कूल न बालदिवस. इनकी दुनिया सीमित है तो बस काम काम और काम,धीरे धीरे बीड़ी के अधजले टुकड़े उठाकर धुआं उडाना, यौन शोषण को खेल मानना इनकी नियति बन जाती है. संगोष्ठी का संचालन संगठन के महानगर उपाध्यक्ष फिरोज अहमद नें तथा धन्यवाद ज्ञापन जिला कोष प्रमुख राजवर्धन ने किया।


इस न्यूज़ को शेयर करे और कमेंट कर अपनी राय दे.
[shareaholic app=”share_buttons” id=”18820564″]

Leave a Reply

Your email address will not be published.