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थम नही रहा, बिहार में मानव तस्करी!

joh street theatre

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सौरभ कुणाल. वैसे तो बिहार में विपक्ष कानून व्यवस्था को लेकर सरकार की खिंचाई हर दुसरे दिन करती है, लेकिन इस बार तो खुद सरकार कि एक मंत्री ने सदन में एक ऐसा ब्यान दे डाला जो सरकार के सुशासन कि पोल खोल रही है बिहार विधान परिषद में भाजपा के रजनीश कुमार द्वारा पूछे गये एक तारांकित प्रश्न का उत्तर देते हुए समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा ने बताया कि बिहार में पिछले पांच सालों के दौरान 1742 लोगों का बचाया गया और मानव तस्करी के दोषी 1287 लोगों को गिरफ्तार किया गया. जनवरी 2011 से नवंबर 2016 तक रेस्क्यू दल द्वारा कुल 1742 लोगों को बचाया गया जिनमें 1001 पुरुष एवं 741 महिलाएं थी.

ये सिर्फ संख्या नही बल्कि युं कहे कि बिहार कि वह तस्वीर पेश कर रहा जिससे इंसानियत शर्मसार हो रही है. मानव तस्करी में सबसे ज्यादा बच्चे और महिलायें होती है. आमतौर पर मानव तस्करी मजदुरी या यौन शोषण के लिए कराया जाता है.

एक आंकरे के अनुसार पुरे विश्व में 80 प्रतिशत से ज्यादा मानव तस्करी यौन शोषण के लिए कराया जाता है. खुद पुलिस भी इस बात को मानती है कि बिहार से हर साल 4000 से भी ज्यादा बच्चो का मानव तस्करी किया जा रहा है. एक अन्य आंकरे के अनुसार ऐसे मात्र 30 प्रतिशत मामलो में ही पुलिस रिपोर्ट दर्ज होता है. ऐसे मे मानव तस्करी की वास्तविक संख्या और ज्यादा हो सकती है.

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समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा ने बताया कि मानव तस्करी के दोषी 1287 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इस कार्य के लिए कुल 372 बचाव अभियान चलाया गया. उन्होंने बताया कि मानव तस्करी रोकने एवं पीड़ितों के पुनर्वास के लिए 12 दिसंबर 2008 से पूरे राज्य में अस्तित्व नामक योजना चलायी जा रही है.

जिला पदाधिकारी की अध्यक्षता में जिला स्तरीय मानव तस्करी विरोधी समन्वय समिति राज्य के सभी 38 जिलों में गठित है. उन्होंने बताया कि इन समितियों द्वारा समय-समय पर बैठक कर मानव तस्करी विरोधी कार्यों की समीक्षा कर कार्रवाई की जाती है. पुलिस उपाधीक्षक की अध्यक्षता में मानव तस्करी विरोधी इकाई सभी 44 पुलिस जिलों रेल जिला सहित में गठित है जिसके द्वारा छपामारी और बचाव का कार्य किया जा रहा है.

मानव तस्करी कितना बड़ा अपराध है इसकी कल्पना इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब भारत में संविधान बनाया जा रहा था उस वक्त संविधान के निर्माताओं ने ऐसे अपराध को देश में मौलिक अधिकारो के विरूद्ध माना था और खासतौर पर देश को ऐसे अपराधों से निजात दिलाने के लिए संविधान में अनुछेद 23 में इसका उल्लेख किया था. लेकिन अफसोस आजादी के 70 साल बाद भी स्तिथि में कुछ खास बदलाव नही आ पाये हैं.

वैसे तो बिहार सरकार छुटभैये अपराधियों पर लगाम लगाने में कुछ हद तक सफल होती है और इस मार्फत केंद्र सरकार भी कभी कभार बिहार के विधि व्यवस्था पर अपने रिपोर्टो के द्वारा पीठ थपथपा देती है, लेकिन जब बात संगठित अपराध कि होती है तब कानून के लंबे हाथ छोटे पड़ जाते हैं, चाहे बात नकली दवाओं कि हो या मानव तस्करी की बिहार सरकार की नाकामी जगजाहिर हो जाती है.

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