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…तो इसलिए पत्रकार राजदेव को भी नही मिलेगा इंसाफ!, पढें पूरी रिपोर्ट

rajdev murder case

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सिवान में एक दैनिक अखबार के पत्रकार राजदेव की हत्या ने एक बार फिर कई सवाल खड़े कर दिए है. यह पहला मौका नहीं है जब किसी पत्रकार की आवाज को खामोश कर दिया गया. अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ के शोध के अनुसार देश में साल 1992 से अब तक 91 पत्रकारों को मौत के घाट उतारा जा चुका है. विडंबना यह है कि सिर्फ 4 प्रतिशत मामलों में ही इंसाफ मिला.

96 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को किया गया माफ़
96 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को माफी मिल गई. 23 मामलों में हत्या के पीछे छिपा मंसूबा नहीं पता चला. सिर्फ 38 मामलों में मोटिव स्पष्ट हो पाया. जिनकी मौत का कारण स्पष्ट हुआ उनमें कई को इंसाफ नहीं मिला. कुछ को मिला तो आधा अधूरा.

सबसे ज्यादा हत्या राजनीतिक कारणों से हुई
सबसे ज्यादा 47 प्रतिशत पत्रकारों की मौत राजनीति क्षेत्रों को कवर करने के दौरान हुई है. उसे बाद भ्रष्टाचार को उजागर करने वाल 37 प्रतिशत पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया. 21 प्रतिशत अपराध, 21 प्रतिशत बिजनेस व 21 प्रतिशत संस्कृति संबंधित क्षेत्रों को कवर करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया गया. वहीं मानवाधिकार को लेकर 18 प्रतिशत पत्रकारों की मौते हुई. आपको बता दें कि जिन पत्रकारों की हत्या हुई वह एक साथ दो तीन क्षेत्रों को देखते थे, इसलिए आंकड़ा 100 प्रतिशत से ऊपर है.

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प्रिंट पत्रकारों को सबसे ज्यादा बनाया गया निशाना
लगभग 88 प्रतिशत पत्रकारों ऐसे पत्रकारों को निशान बनाया गया जो प्रिंट मीडिया में काम करते थे. 12 प्रतिशत टीवी पत्रकारों की हत्या की गाई. वहीं 8 प्रतिशत रेडियो व इंटरनेट पत्रकारिता करने वालों का निशाना बनाया गया.

हत्या का शक राजनीतिक दलों पर सबसे ज्यादा
पत्रकारों की हत्या के बाद जांच में पाया गया कि 36 फीसदी पत्रकारों कि हत्या में राजनीतिक दलों के हाथ होने की आशंका जताई गई. 28 फीसदी हत्याओं में किसी आपराधिक समूह पर शक किया गया. स्थानीय लोगों के शामिल होने की आशंका 12 फीसदी हत्याओं में हुई. वहीं 12 फीसदी हत्याओं में किसी सरकारी अधिकारी व पैरामिलिट्री पर शक किया गया.

पत्रकारों की हत्या के मामले में भारत दुनिया में 14वें स्थान पर
पूरी दुनिया में ऐसे कई देश है जहां पर पत्रकारों की मौत के बाद उन्हें इंसाफ नहीं मिला. भारत ऐसे देशों की सूची में 14वीं स्थान पर है. इन देशों की सूची में सबसे ऊपर सोमानिया और इराक है. इसके अलावा पाक, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका जैसे देश भी शामिल है. इन सभी देशों के 83 फीसदी मामले अब भी अनसुलझे हें 96 फीसदी मामलों में स्थानीय पत्रकारों को निशाना बनाया गया था. प्रत्येक दस में से चार पत्रकारों को बंदी बनाया गया या पहले धमकियां मिली थी.
(स्रोत:हिंदुस्तान)

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