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सात में पांच बच्चे दृष्टिहीन ,पत्नी की कैंसर से मौत के बाद अब ईच्छामृत्यु की गुहार लगाता यह पिता


प्रभाकर कुमार : एक तो गरीबी और दूसरी दृष्टीहीनता, यह लाचारी उस पिता की है, जिसके पांच बच्चे जन्म से ही दृष्टीहीन हैं. उसके कंधे अब अपने ही बच्चों का बोझ उठाने में कमजोर साबित हो रहे हैं. उनकी यह कथन कोई सहायता नहीँ तो ईच्छा मौत के इजाजत ही दे सरकार सुनकर लोग भले हतप्रभ रहते हैं पर आगे कोई नहीं आता.

45 वर्षीय लील बहादुर नवादा जिले के हिसुआ का रहने वाला है. वे गरीबी और लाचारी के कारण नेपाल से हिसुआ आकर अपनी पत्नी संग बस गय़ा था. एक रुपया प्रति दुकान से लेकर पहरेदारी कर जीवन की नईया चलाना शुरू किया. समय बीतता गय़ा और एक के बाद एक दृष्टिहीन बच्चे होते गए. अंत की दो बेटी को छोड़ लील बहादुर के सात में से पांच बच्चे जन्म से ही दृष्टीहीन हैं. उसकी पत्नी का भी दो वर्ष पहले निधन हो गया. वह कैंसर से पीड़ित थीं.

पत्नी के जाने के बाद लील बहादुर बिल्कुल अकेला हो गया. बच्चों की पढ़ाई तो दूर उनका खानपान भी लील बहादुर के वश का नहीं रहा. बड़ी बात यह कि उसके खानदान में पहले कोई ऐसा नहीं था. हिसुआ अंदर बाजार में स्थित लील बहादुर का जीर्णशीर्ण मकान से इन सबका आशियाना है. सरकारी राहत के नाम पर इन्हें दिव्यांगता पेंशन की राशि मिलती है. इंदिरा आवास सहित कई सरकारी योजनाओं का लाभ अब भी लील बहादुर को नहीं मिल पा रहा.

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ऐसे में जवानी की दहलीज पर कदम रखते सभी बच्चों की परवरिश लील बहादुर पर भारी पड़ रही है. लील बहादुर के पांच दिव्यांग बच्चों में सबसे बड़ा संतोष है, उसकी उम्र 17 वर्ष है. इसके बाद बेटी मुन्नी की उम्र 16 वर्ष है. तीसरे नंबर पर 12 वर्ष का विकास, चौथे पर 10 वर्ष का आकाश व पांचवें नंबर पर 7 वर्ष का प्रकाश है. इन बच्चों के बीच लील बहादुर दो बेटियां हैं, जो स्वस्थ हैं. आंखों से दिव्यांग बच्चों के लिए पढ़ाई के संसाधन नहीं होने के कारण पढ़ाई की जगह बच्चे गायन को रोजगार का साधन बना रहे हैं.

हिसुआ के शिक्षाविद् मिथिलेश कुमार सिन्हा की पहल पर लील बहादुर की दर्द भरी आवाज जिला बाल कल्याण समिति तक पहुंचाई गयी. समिति के चेयरपर्सन एडवोकेट राजीव नयन ने लील बहादुर के घर जाकर उनके बच्चों से बातचीत की. एडवोकेट राजीव ने बताया कि किशोर न्याय अधिनियिम के सेक्शन 2 के तहत बच्चों की देखभाल व परवरिश का इंतजाम किया जायेगा. इनकी पढ़ाई के लिए पटना के एक दिव्यांग स्कूल में बातचीत की जायेगी. इस बीच सामाजिक सरोकार से जुड़े संगठनों व लोगों से भी बच्चों के संभावित इलाज के लिए सहयोग की अपील की गयी है. पर अबतक कोई सहायता न मिलना लील बहादुर का हिम्मत पस्त कर रहा है. बच्चों की बदहाली देख लाचार पिता इच्छा मौत की भी बात बार-बार करता है.

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