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दुर्गा पूजा पर बिहार के कत्यायनी मंदिर के बारे में जानियें, पढ़ने के बाद जरुर जाने का प्लान बनायेंगे

katyayani maa

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सिमरी बख्तियारपुर(सहरसा) ब्रजेश भारती :- नवरात्रि में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत ही विधि-विधान से माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है. सभी रूपों की अपनी अलग अलग विषेशता है लेकिन छठे स्वरूप के रूप में स्थापित सहरसा मानसी रेलखंड के धमाराधाट रेलवे स्टेशन से दक्षिण लगभग एक किलोमीटर की दुरी पर मां कत्यायनी मंदिर स्थापित है.

छठवीं देवी कात्यायनी के बारे में :- नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है. इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है. उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं. जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं. इस देवी को नवरात्रि में छठे दिन पूजा जाता है.

51 शक्तिपीठों में एक है मां कात्यायनी :-

51 शक्तिपीठों में एक मां कात्यायनी स्थान को माना जाता है. हैरत की बात है कि सहरसा – मानसी रेलखंड के धमारा घाट रेलवे स्टेशन के निकट दशकों बाद भी यह स्थल उपेक्षित है. हालांकि, बागमती नदीं के तट पर स्थापित कात्यायनी स्थान की और अब भी सरकार की नजर नहीं पड़ी रहीं है कि इसे पर्यटन स्थल का दर्जा दिया जाए . अब तक पर्यटक का दर्जा नहीं मिलने से मायुस है इलाके के लोग व श्रद्धालु .

मां कात्यायनी मंदिर के इतिहास :-

दिल्ली के महरौली से आए सेंगर वंश के राजा मंगल सिंह को मुगल बादशाह अकबर ने 1595 में खगड़िया जिले के चौथम तहसील देकर मुरार शाही की उपाधि से नवाजा था. राजा व उनके मित्र श्रीपत जी महाराज को यह पवित्र स्थल शिकार एवं गौ चराने के क्रम में मिला. किंवदंती है कि श्रीपत जी महाराज हजारों गाय-भैंसों के मालिक थे. चरने के क्रम में उक्त स्थल पर गाय स्वत: दूध देने लगती थी. जिसे देखकर दोनों को हैरत . अचरज होता था.

स्वप्न में मां ने दिया था आदेश :-

लोगों का कहना है कि राजा को मां ने स्वप्न में दर्शन देकर वहां मंदिर बनाने का आदेश दिया था. इसी पर दोनों ने उक्त स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया. खुदाई के क्रम में उस स्थान से मां का हाथ मिला. जिसकी पूजन आज तक की जा रही है. मां कात्यायनी के पूजा के बाद आज भी यहां श्रीपत जी महाराज की पूजा की जाती है. यहां के लोक गीतों में भी राजा मंगल सिंह और श्रीपत जी की चर्चा करते हैं.

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क्या है श्रद्धालुऔं की मान्यताएं :-

लोगों के शारीरिक कष्ट एवं पशुओं (गाय, भैंस) के रोगों के निवारण के लिए श्रद्धालु मां कात्यायनी से याचना करते हैं. मनोकामना पूर्ण होने पर मां को दूध का चढ़ावा चढ़ाते हैं. रास्ते में घंटों समय लगने के बावजूद चढ़ावा का दूध जमता या फटता नहीं है. मां कात्यायनी स्थान न्यास समिति के सदस्य युवराज शंभु . कैलाश वर्मा . चंदेश्वरी राम समेत अन्य स्थानिय ग्रामीण विजय सिंह . ललन यादव . राजेश कुमार आदि ने बताया कि अन्य शक्तिपीठों की तरह इस शक्तिपीठ का भी विकास होना अति आवश्यक है. प्रत्येक सोमवार एवं शुक्रवार को वैरागन के अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए पैसों से मंदिर का विकास हो रहा है. हाल के दिनों में कात्यायनी स्थान को विकसित करने के लिए ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा प्राक्कलन तैयार कर सरकार को भेजा गया है. लेकिन इसे पर्यटन स्थल का दर्जा मिलने का अब तक आश पूरी नही हो सकी है.

देश विदेश से आते है श्रद्धालु :-

सहरसा – खगड़िया . मधेपुरा . हसनपुर . दरभंगा . सुपोल . फारबिसगंग . कटिहार. पूर्णीयां . समस्तीपुर . मुंगेर. बेगुसराय सहित अन्य जिले के अलावे परोसी देश नेपाल से श्रद्धालु मां कात्ययानी स्थान में पूजा – अर्चना करने आते है.श्रद्धालुओं का मानना है कि मां के दरबार में सच्चे में से आने वाले का हर मुरादे पुरी होती है.

क्या कहते है श्रद्धालु व अन्य स्थानिय ग्रामीण :-
मनोहर यादव,संजय यादव,दिनेश यादव,रबिन चौधरी,सुधीर चौधरी सुर्दशन कुमार यादव,बब्लु सिंह,मनोज सिंह आदि कहते हैं कि सरकार चाहे तो मां कात्यायनी स्थान पर्यटक स्थल बन सकता है . कई बार सरकार से इस समस्या के बारे में बताया गया लेकिन अब तक इतने महत्वपूर्ण स्थल पर पहुंचने के लिए पक्की सड़क का निर्माण नहीं होना दुखद है. वहीं पर्यटन विभाग को सड़क संबंधी प्राक्कलन भी भेज दिया गया है. लेकिन निर्माण कार्य ढ़ाक के तीन पात जैसी कहावत को चरितार्था हो रही है.

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