आसान नहीं है कन्हैया के लिए बेगुसराय की राह, राजद के सपोर्ट के बाद भी हार

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kanhaiya kumar

ब्लॉग. परबिंद कुमार. जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के लिए इतना आसान नहीं होगा संसद में जाना. भूमिहार के गढ़ में वामपंथ के टूटे हुए किले में वामपंथी विचारधारा से जितना कन्हैया के लिए सपने जैसा है. उनकी छवि पहले से ही देश द्रोही की बनी हुई है ऐसे बहुत कम ही उम्मीद है की आज के बढे लिखे भूमिहार कन्हैया कुमार को बेगुसराय जितने देंगे.

हालांकि लालू यादव के समर्थन के कारण उन्हें यादव और मुस्लिम वोटरों का समर्थन मिलेगा लेकिन यह काफी नहीं होगा चुनाव जितने के लिए. कन्हैया का घर बेगूसराय के बीहट गांव में है जो तेघरा विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है.

तेघरा को कभी मिनी मास्को के नाम से भी जाना जाता था. 1962 के बाद से 2010 तक यह सीट सीपीआई के कब्जे में रही. कन्हैया खुद भूमिहार जाति से हैं जिसका दबदबा इस सीट पर शुरू से रहा है. लगभग 17 लाख मतदाताओं में भूमिहारों की संख्या सबसे ज्यादा है, इसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग, मुसलमान और अनुसूचित जातियों की संख्या है. ओबीसी में कुशवाहा यानी कोईरी की संख्या सबसे ज्यादा है.

90 से 2000 के बिच भूमिहारों की रणवीर सेना और माले से दो दो हाथ हुआ. इस खुनी संघर्ष के बाद से भूमिहार एकजुट हो गये और फिर धीरे-धीरे वामपंथ का किला ढहना शुरू हो गया. फिर वहां के लोग कांग्रेस की तरफ झुके और राजो सिंह जैसे नेता का कद बढ़ा. पर, कांग्रेस का राजद के साथ गठबंधन भूमिहारों को पसंद नहीं आया. यहां से वो समता पार्टी-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के साथ चले गए.

इसलिए अगर जातीय समीकरण के मद्देनजर इस चुनावी क्षेत्र का विशलेषण किया जाये तो बिना भूमिहारो के समर्थन से कन्हैया कुमार का जितना आसन नहीं होगा.

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